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आशीर्वाद रंग मंडल के नाट्य महोत्सव के पहले दिन "पश्मीना" देख मंत्र मुग्ध हुए दर्शक
BINOD KARN
BEGUSARAI : आशीर्वाद रंगमंडल के तत्वावधान में शुक्रवार को दिनकर कला भवन में 10वां राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव प्रारंभ हुआ। महोत्सव के पहले दिन प्रथम सत्र में दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का उद्घाटन अतिथियों ने किया।
इस मौके पर DM तुषार सिंगला ने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि बेगूसराय राष्ट्रकवि दिनकर की उर्वरा भूमि है। रंगकर्मियों को इससे प्रेरणा लेने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह गर्व का विषय है कि कला, संस्कृति को संजोने व संवारने में बेगूसराय के रंगकर्मी, साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी लगातार प्रयासरत हैं। आशीर्वाद रंगमंडल के कलाकारों को महोत्सव के मौके पर शुभकामना व्यक्त करते हुए DM ने कहा कि बिहार सरकार कला संस्कृति के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने जिलेवासियों से अपील करते हुए कहा कि आप नाटक अवश्य देखें। कलाकारों को प्रोत्साहित करने का दायित्व हम सबों का है।
समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ अंजुला महर्षि ने कहा कि अपने देश में नाटक के हिसाब से बहुत कम ही मंच का निर्माण किया गया है। इस कारण नाटक के मंचन में कलाकारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। बेगूसराय का यह मंच भी नाटक के उपयुक्त नहीं है फिर भी यहां के कलाकारों के जज्बा की जितनी प्रशंसा की जाय वह कम है। उन्होंने कहा कि विपरीत लाइटिंग व्यवस्था और कठिन परिस्थितियों में भी कलाकार अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं। आशीर्वाद रंगमंडल के इस साहसिक कदम के लिए बधाई देती हूं। मंच पर आगत अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र, मोमेंटो व बुके देकर रंगमंडल के सचिव व फेस्टिवल डायरेक्टर डॉ. अमित रौशन एवं संस्था के अध्यक्ष ललन प्रसाद सिंह ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता ललन प्रसाद सिंह एवं संचालन रंगकर्मी अभिजीत कुमार मुन्ना ने किया।
मंच पर डॉ अंजुला महर्षि, संजय महर्षि, डॉ अजय जोशी, सुरभित दत्त सिन्हा, महामंत्री, उत्तर बिहार संस्कार भारती बिहार प्रदेश रंग समीक्षक अजीत राय, रंग समीक्षक संजय कुमार, संस्कार भारती के बिहार-झारखंड के संगठन मंत्री वेदप्रकाश, नगर निगम बेगूसराय की मेयर पिंकी देवी, पूर्व मेयर संजय कुमार, भाजपा पूर्व जिलाध्यक्ष राजकिशोर सिंह, डॉ. रंजन चौधरी मौजूद थे। इस मौके पर डीएम तुषार सिंगला एवं मेयर पिंकी देवी ने वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अंजुला महर्षि को रामविनय रंग सम्मान से सम्मानित किया। इस सम्मान में 15 हजार रुपए नगद राशि के साथ मोमेंटो, शॉल व बुके देकर सम्मानित किया गया। समारोह में शिक्षाविद् अशोक कुमार सिंह अमर, अभिषेक कुमार, विश्वरंजन राजू, नरेन्द्र कुमार सिंह, पंकज कुमार, दीपक कुमार समेत सैकड़ों सुधि दर्शक मौजूद थे।
*पश्मीना के मंचन में निदेशक डॉ अमित ने कलाकारों के चयन में दिखाया अद्भुत प्रतिभा*
*हरेक कलाकार ने अदा किया जीवंत भूमिका, हर दृश्य पर बजती रही तालियां, संवाद भी तारीफ-ए-काबिल*
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में डॉ. अमित रौशन निर्देशित नाटक पश्मीना का मंचन किया गया। रूप सज्जा व लाइटिंग सिस्टम की तो बात छोड़िए प्रत्येक कलाकार का संवाद अपने आप में प्रशंसनीय रहा। भाव-भंगिमा भी अपना छाप छोड़ दिया। लगा निदेशक डॉ अमित रौशन ने कलाकारों के चयन में काफी कसरत की होगी, तभी तो पूरे मंचन के दौरान तालियां बजती रही।
नाटक ’’पश्मीना’’ कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखा एक मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण एक संवेदनशील नाटक है, जो मानवीय रिश्तों के ताने-बाने को पश्मीना के नाजुक धागे से जोड़ता है। नाटक ’ये’ और ’वो’ की लड़ाई में एक कुशल कबूतरबाज की तरह मानवता की पतली रस्सी पर चलकर संतुलन बनाने की एक कोशिश करता है।एक मध्यम वर्ग के जोड़े विभा और अमर सक्सेना अपनी अपनी पत्नी के साथ छुट्टियों की योजना बना रहे हैं। वे हर साल एक नई जगह की यात्रा करते हैं और उस राज्य से कुछ अनोखा लेकर आते हैं। विभा कश्मीर जाने से कतराती है, उनके अस्तित्व में एक अकथनीय खोखलापन है, जिससे कि उनका रोजमर्रा का आदान-प्रदान भी श्रम साध्य लगता है। जैसे कि वे सामान्य होने की कोशिश में अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं। जब वे कश्मीर जाने का मन बनाते हैं तो वे पश्मीना शॉल लेने का फैसला करते हैं। अपनी खोई हुई मातृभूमि के प्रति उदासीन पड़ोसी से सलाह लेते हुए, वे शॉल की एक विशेष विक्रेता के पास जाने का फैसला करते हैं। अपने होटल में उनकी मुलाकात एक पंजाबी रविन्द्र और स्वीटी से होती है। रविन्दर दिल्ली का विशिष्ट डींगे हांकने वाला व्यवसायी है, जो अपनी संपत्ति और संबंधों का घमंड करता है। सक्सेना परिवार को शॉल की दरें उनके बजट से अधिक लगती है। दुकानदार समझता है कि ये सामान्य मोल-भाव करने वाले पर्यटक नहीं हैं। वे साझा हानि और दुख से उत्पन्न एक अनकहा संबंध बनाते हैं। इस तरह एक मूल्यवान पश्मीना शॉल दोनों तरफ की पीड़ा के उपचार का प्रतीक बन जाता है। मृणाल माथुर लिखित नाटक पश्मीना, जो एक बहुत ही नाजुक धागों से बुना हुआ होता है। ठीक उसी प्रकार मानवीय संबंध भी बहुत ही नाजुक होता है। पश्मीना शॉल को प्रतीक बनाकर लेखक इंसानी संबंधों के मानवीय संवेदनाओं, संबंधों की जटिलता को दिखाया है। जीवन में हम बड़े-छोटे, ये और वो के चक्कर में बंटे रहते हैं। भौतिक साधनों की पूर्ति हेतु आपसी संबंधों को भूलकर अपने को सर्वोपरि साबित करने में बहुमूल्य जीवन गंवा देते हैं। मैंने अपने कलाकारों के अभिनय, संगीत व इम्प्रोवाइजेशन को आधार बना कर लेखक की कल्पना को आप दर्शकों के समक्ष रखने का प्रयास किया है। नाटक में अमर सक्सेना के किरदार को सचिन कुमार
विभा सक्सेना के रूप में कविता कुमारी ने सजीव अदाकारी की। वहीं सचिन कुमार डॉ. कौल, कुणाल भारती रविन्दर ढिल्लो एवं रितु कुमारी ने स्वीटी की जीवंत भूमिका अदी की। दुकानदार के रूप में अरूण कुमार, दुकानदार के बेटा के रूप में शुभम कुमार, वेटर की भूमिका में बिट्टू कुमार तथा फौजी के रूप में शुभम कुमार की अदाकारी को लोगों ने खूब सराहा।
नाटक में सहयोगी के तौर पर संगीत-अमन शर्मा, प्रकाश-वरूण, मेकअप- सचिन कुमार, वस्त्र-विन्यास- मोहित मोहन, रितु कुमारी, सेट निर्माण-विजय शर्मा, प्रोपर्टी-कुणाल भारती, सहायक-पंकज कुमार सिन्हा, धर्मेन्द्र कुमार, रिषभ कुमार,
मोहित मोहन, आशीष कुमार, विष्णु कुमार, सेट डिजाइन वरिष्ठ चित्रकार सीताराम ने किया। महोत्सव के दूसरे दिन 22 मार्च
शनिवार को नई दिल्ली से आई टीम के कलाकारों द्वारा नाटक ऑल माय संस का मंचन होगा वहीं रविवार को चंदन सेन द्वारा निर्देशित नाटक अनिकेत संध्या का मंचन होगा। महोत्सव का समापन 26 मार्च को होगा।