आखिर 'सुशासन बाबू' के मन में क्या खिचड़ी पक रही है? पढ़ें विकास वर्मा की कलम से...
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आखिर 'सुशासन बाबू' के मन में क्या खिचड़ी पक रही है? पढ़ें विकास वर्मा की कलम से...

Nitish Kumar Deep Politics in Bihar, Hindi Article

लेखक: विकास वर्मा 
संपादक (www.tophindinews.com)
Published on 13 March 2023 (Update: 13 March 2023, 18:10 IST)

नीतीश कुमार को चाहे राजनेता जिस भी उपनाम से बुलाएं, लेकिन हम पत्रकार लोग उन्हें 'सुशासन बाबू' ही कहना चाहेंगे, और इसका कारण कोई छिपा हुआ नहीं है।

चूंकि बिहार में एक लंबे अंतराल के बाद कम से कम कानून का राज जरूर स्थापित हुआ।

बहरहाल बात जब नीतीश कुमार की चल रही है, तब यह यह बात भी सामने आती है कि, जिस तरीके से उन्होंने बिल्कुल विपरीत ध्रुव वाली पार्टियों के साथ अलग-अलग समय पर गठबंधन किया है, उसकी मिसाल वर्तमान राजनीति में तो नहीं ही दिखती है।

ऐसे में उनके किसी भी कदम को लेकर अंदाजा लगाना बड़ा मुश्किल होता है, कि उनके मन मस्तिष्क में आखिर कौन कौन सी खिचड़ी पक रही है!

अब हाल-फिलहाल की बात को ही ले लीजिए! 

जिस प्रकार से राष्ट्रीय जनता दल के शीर्ष नेताओं पर सीबीआई और ईडी का छापा पड़ा, उसने तेजस्वी यादव समेत पूरे यादव परिवार को और समस्त राष्ट्रीय जनता दल को आक्रोशित कर दिया।
यहां तक कि कांग्रेस समेत दूसरे दलों ने भारतीय जनता पार्टी की आलोचना की और केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए पत्र तक लिख डाला।

पत्र लिखने वालों में न केवल राजद के तेजस्वी यादव, बल्कि पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, दिल्ली के चीफ मिनिस्टर अरविंद केजरीवाल, तेलंगाना के चीफ मिनिस्टर के चंद्रशेखर राव और दूसरे तमाम नेता शामिल थे, लेकिन इस लिखे गए पत्र से नीतीश कुमार ने दूरी बना ली। 

जब पत्रकारों ने उनसे इस मामले में कमेंट मांगा तो पहले तो उन्होंने इसे अनदेखा किया और यह कहा कि इसमें हमारा कमेंट करने की क्या आवश्यकता है?

बाद में उन्होंने जरूर गोलमोल जवाब दिया कि पहले जांच में क्या मिला, आदि...

पर नीतीश कुमार की राजनीति को देखें तो हाल-फिलहाल ऐसे कई सिग्नल दिख रहे हैं, जिसमें कहीं ना कहीं यह भनक मिल रही है कि कहीं 2024 के पहले एक बार फिर कोई और 'राजनीतिक खिचड़ी' ना पक जाए!
हालांकि यह अभी दूर की कौड़ी है, लेकिन कुछ बातों पर गौर करना जरूरी हो जाता है क्योंकि कुछ मामलों में तेजस्वी के रुख के विपरीत नीतीश कुमार ने अपना रुख दिखाया है।

इनमें सबसे बड़ा मामला है तमिलनाडु में बिहार के मजदूरों पर किया गया कथित हमला।

तमिलनाडु राज्य से इस तरह की कई खबरें सोशल मीडिया पर और दूसरी जगह पर आयीं।
 भारतीय जनता पार्टी द्वारा यह मुद्दा विधानसभा में भी उठाया गया था, किंतु बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने इसको सिरे से खारिज कर दिया।

ये बातें राजनीति में संयोग नहीं कही जा सकती हैं कि सरकार के शीर्ष दो राजनेता किसी मुद्दे पर तथ्यात्मक रूप से अलग राय रखें !

अगर इसे संयोग मानकर छोड़ भी दिया जाता है, तो एक और मामला आया जिसमें गलवान मामले में शहीद हुए एक सैनिक के पिता द्वारा सरकारी जमीन पर स्मारक बनाने के मामले को लेकर बिहार पुलिस द्वारा पिटाई की गयी थी। 

इसको लेकर बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव द्वारा बिहार पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया गया, वहीं सीएम नीतीश कुमार का स्टैंड इस मामले में बिल्कुल अलग था। उन्होंने न केवल जांच के आदेश दे दिए, बल्कि यह भी कहा कि शहीद के पिता को परेशान क्यों किया गया?

हालाँकि बाद में उन्हें कोर्ट से जमानत मिल गई। इसके अलावा भी कुछ ऐसी बातें हुई हैं, जिनको सामान्य तौर पर तो औपचारिकता कहा जा सकता है, किंतु बिहार के राज्यपाल की नियुक्ति से लेकर नीतीश कुमार के जन्म दिवस 1 मार्च को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा फोन करके जन्मदिन की बधाई देना, इसके अलावा खुद पीएम मोदी और नितिन गडकरी द्वारा सोशल मीडिया पर नीतीश कुमार को बधाई दिया जाना भी कहीं ना कहीं आने वाले दिनों में कोई बड़ा 'राजनीतिक खेल' शुरू करने के लिए दरवाजे खुलने की तरफ तो इशारा करता ही है!

इसके अलावा बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तारकिशोर प्रसाद के श्राद्ध कर्म में शामिल होने के लिए खुद नीतीश कुमार कटिहार गए थे।
 इसे भी फॉर्मेलिटी कहा जा सकता है, किंतु ऐसे मामलों में एक शोक संदेश देकर सामान्य तौर पर विरोधी पार्टियों के शीर्ष नेता इतिश्री कर लेते हैं।

खैर, नीतीश के मन की बात तो वही जानें,  क्या खिचड़ी पक रही वही जानें, किंतु यह बिहार का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि, राजनीतिक रूप से बिहार के लिए वो भी कुछ खास नहीं कर पाए हैं। 
अब चाहें रोजगार के स्तर पर ही बात कर ली जाए, इसे लेकर लोगों के मन में निराशा साफ दिखती है।

बीते 3 दशकों से अधिक समय से बिहार के लोग बाहर के राज्यों में उपेक्षित रूप से कार्य करते हैं, और अपमानित होते हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में कोई कहीं नहीं जा सकता, जरूर जा सकता है, और लोग जाते भी हैं, किंतु बिहार का मामला अपेक्षाकृत थोड़ा अलग है।

इतने बड़े स्तर पर पलायन के बारे में अगर राजनेताओं में कुछ 'विकास की खिचड़ी' बनती, तो उसकी बात ही कुछ और होती, किंतु राजनीतिक धमाचौकड़ी से किसी को फुर्सत मिले तब तो कुछ काम की बात हो!

वह चाहें राजद हो, चाहे भाजपा हो, चाहे खुद 'सुशासन बाबू' ही क्यों ना हों?

आप क्या सोचते हैं, कमेंट बॉक्स में एक बार जरूर बताइए कि कितना संभव है बिहार में सुशासन बाबू की एक और 'उलटबांसी'!


Web Title: Nitish Kumar Deep Politics in Bihar, Hindi Article

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